अभिमन्यु और चक्रव्यूह: अधूरे ज्ञान की सबसे बड़ी कथा
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महाभारत के तेरहवें दिन द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह रचा। अभिमन्यु ने माता सुभद्रा के गर्भ में रहते हुए उसमें प्रवेश करना सीखा था, किंतु निकलने की विधि नहीं सुन पाया था। जयद्रथ ने शेष पांडवों को द्वार पर रोक दिया और अभिमन्यु अकेला घिरकर मारा गया।
महाभारत की सबसे मार्मिक कथाओं में अभिमन्यु और चक्रव्यूह का प्रसंग है। यह केवल एक युद्ध-गाथा नहीं — यह अधूरे ज्ञान के परिणाम की कथा है।
गर्भ में सुना ज्ञान
कथा के अनुसार जब सुभद्रा गर्भवती थीं, अर्जुन उन्हें चक्रव्यूह भेदन की विधि सुना रहे थे। गर्भस्थ अभिमन्यु ने वह सब सुना।
किंतु व्यूह से निकलने की विधि बताते समय सुभद्रा को निद्रा आ गई। कथा-भेद के अनुसार कुछ जगह यह प्रसंग कृष्ण के कथन के रूप में आता है। परिणाम एक ही रहा — अभिमन्यु ने प्रवेश सीखा, निर्गमन नहीं।
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तेरहवाँ दिन
कुरुक्षेत्र युद्ध के तेरहवें दिन द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की। यह एक ऐसी व्यूह-रचना थी जिसमें सेना घूमते हुए चक्र के आकार में खड़ी होती है और भीतर जाने वाला घेरे में फँसता चला जाता है।
अर्जुन उस दिन संशप्तकों से युद्ध करने दूर गए थे। शेष पांडवों में कोई भी चक्रव्यूह भेदना नहीं जानता था।
अभिमन्यु ने कहा कि वह भीतर प्रवेश कर सकता है, पर निकलना नहीं जानता। युधिष्ठिर ने आश्वासन दिया कि वह द्वार खोलेगा और शेष योद्धा उसके पीछे प्रवेश कर जाएँगे।
जयद्रथ का अवरोध
अभिमन्यु ने व्यूह भेदकर प्रवेश किया। किंतु उसके पीछे आ रहे पांडवों को जयद्रथ ने द्वार पर रोक दिया।
जयद्रथ को भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि वह एक दिन अर्जुन को छोड़कर शेष पांडवों को रोक सकेगा। उसी वरदान का उपयोग उसने इस दिन किया।
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अभिमन्यु भीतर अकेला रह गया।
अकेले का युद्ध
सोलह वर्ष के अभिमन्यु ने अकेले ही महारथियों से युद्ध किया। द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, दुर्योधन, दुःशासन — सभी उसके सामने थे।
युद्ध के नियमों के विरुद्ध जाकर कई योद्धाओं ने एक साथ उस पर प्रहार किया। उसका धनुष तोड़ा गया, रथ नष्ट किया गया, सारथी मारा गया। निःशस्त्र होने पर उसने रथ का पहिया उठाकर युद्ध किया।
अंततः वह मारा गया — नियमों का उल्लंघन कर, घेरकर।
अर्जुन की प्रतिज्ञा
लौटकर जब अर्जुन को यह ज्ञात हुआ, उन्होंने प्रतिज्ञा की कि अगले दिन सूर्यास्त से पूर्व जयद्रथ का वध करेंगे, अन्यथा स्वयं अग्नि-प्रवेश करेंगे।
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अगले दिन की वह घटना — जयद्रथ वध — महाभारत का एक और प्रसिद्ध प्रसंग है।
कथा का भाव
यह कथा अधूरे ज्ञान के विषय में है। अभिमन्यु का साहस असंदिग्ध था, उसका कौशल भी। कमी केवल एक थी — वह जानता था कि भीतर कैसे जाना है, बाहर कैसे आना है यह नहीं जानता था।
इसीलिए इस प्रसंग को अक्सर इस अर्थ में उद्धृत किया जाता है कि किसी कार्य में प्रवेश से पूर्व उससे निकलने का मार्ग भी जान लेना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अभिमन्यु ने चक्रव्यूह कहाँ से सीखा था?
माता सुभद्रा के गर्भ में रहते हुए। अर्जुन जब चक्रव्यूह भेदन की विधि सुना रहे थे, तब गर्भस्थ अभिमन्यु ने वह सुना।
अभिमन्यु व्यूह से निकल क्यों नहीं सका?
निर्गमन की विधि बताते समय सुभद्रा को निद्रा आ गई थी, इसलिए वह भाग अभिमन्यु नहीं सुन सका।
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जयद्रथ ने पांडवों को कैसे रोका?
उसे भगवान शिव से वरदान प्राप्त था कि वह एक दिन अर्जुन को छोड़कर शेष पांडवों को रोक सकेगा। उसी का उपयोग उसने तेरहवें दिन किया।
अभिमन्यु की आयु क्या थी?
परंपरागत मान्यता के अनुसार लगभग सोलह वर्ष।





