भीष्म प्रतिज्ञा: देवव्रत ने पिता के लिए क्या त्यागा
Short answer
देवव्रत ने अपने पिता शांतनु के विवाह के लिए राजगद्दी और आजीवन ब्रह्मचर्य दोनों का त्याग किया। सत्यवती के पिता की शर्त थी कि राज्य उन्हीं के वंश को मिले। इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण देवव्रत भीष्म कहलाए और उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान मिला।
महाभारत में भीष्म प्रतिज्ञा का प्रसंग पूरे महाकाव्य की दिशा तय करता है। यदि यह प्रतिज्ञा न होती, कुरुक्षेत्र शायद कभी न होता।
गंगा और शांतनु
हस्तिनापुर के राजा शांतनु ने गंगा से विवाह किया था, इस शर्त पर कि वे उनके किसी कार्य पर प्रश्न नहीं करेंगे। गंगा ने अपने सात पुत्रों को जन्म के बाद नदी में प्रवाहित कर दिया।
आठवें पुत्र के समय शांतनु स्वयं को रोक न सके और प्रश्न कर बैठे। शर्त टूटने पर गंगा ने सत्य बताया — वे सात वसु थे, जो श्राप के कारण जन्म ले रहे थे और मुक्ति चाहते थे — और वे उस आठवें पुत्र को लेकर चली गईं।
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वही आठवाँ पुत्र देवव्रत था, जो वर्षों बाद शिक्षित होकर पिता के पास लौटा।
सत्यवती और शर्त
कुछ समय बाद शांतनु का मन निषादराज की पुत्री सत्यवती पर आया। विवाह का प्रस्ताव लेकर वे निषादराज के पास गए।
निषादराज ने शर्त रखी — विवाह तभी होगा जब सत्यवती का पुत्र ही हस्तिनापुर का उत्तराधिकारी बने।
शांतनु के लिए यह असंभव था। देवव्रत युवराज घोषित हो चुका था और सर्वथा योग्य था। शांतनु ने प्रस्ताव त्याग दिया, किंतु मन से रुग्ण रहने लगे।
दो त्याग
देवव्रत को जब पिता की व्यथा का कारण ज्ञात हुआ, वे स्वयं निषादराज के पास गए और प्रतिज्ञा की कि वे कभी हस्तिनापुर की गद्दी पर नहीं बैठेंगे।
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निषादराज ने तब भी संदेह प्रकट किया — देवव्रत की संतान भविष्य में दावा कर सकती है।
तब देवव्रत ने दूसरी और अधिक कठिन प्रतिज्ञा की — आजीवन ब्रह्मचर्य। न विवाह, न संतान।
भीष्म नाम
यह प्रतिज्ञा इतनी भीषण थी कि देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और उसी क्षण से देवव्रत भीष्म कहलाए — जिसका अर्थ है भीषण प्रतिज्ञा करने वाला।
प्रसन्न होकर शांतनु ने उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान दिया — मृत्यु उनकी अपनी इच्छा से ही आएगी।
परिणाम
यही वरदान आगे चलकर उनके लिए भार बना। भीष्म ने अपने सामने पूरे वंश का पतन देखा — सत्यवती के दोनों पुत्रों की अकाल मृत्यु, धृतराष्ट्र और पांडु की संतानों का विभाजन, और अंततः कुरुक्षेत्र।
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प्रतिज्ञा के बंधन में बँधे होने के कारण वे हस्तिनापुर के सिंहासन के प्रति निष्ठा से बँधे रहे और द्रौपदी के अपमान के समय भी मौन रहे। यह मौन महाभारत में उनके चरित्र का सबसे विवादित पक्ष माना जाता है।
वे शरशय्या पर पड़े रहे और उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हुए ही देह त्यागी।
कथा का भाव
भीष्म का चरित्र महाभारत के सबसे जटिल चरित्रों में है। उनका त्याग असाधारण था, किंतु महाकाव्य यह प्रश्न भी छोड़ जाता है — क्या किसी प्रतिज्ञा का पालन अन्याय के समक्ष मौन रहने का कारण बन सकता है?
यही प्रश्न इस कथा को केवल आदर्श की गाथा नहीं, एक नैतिक विचार-बिंदु बनाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भीष्म का वास्तविक नाम क्या था?
देवव्रत। भीषण प्रतिज्ञा करने के कारण उन्हें भीष्म नाम मिला।
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भीष्म ने प्रतिज्ञा क्यों की?
पिता शांतनु के सत्यवती से विवाह के लिए। निषादराज की शर्त थी कि राज्य सत्यवती के पुत्र को मिले, इसलिए देवव्रत ने गद्दी और आजीवन ब्रह्मचर्य दोनों त्यागे।
भीष्म को कौन सा वरदान मिला था?
इच्छा-मृत्यु का — मृत्यु उनकी अपनी इच्छा से ही आएगी। यह वरदान उन्हें पिता शांतनु ने दिया था।
गंगा ने अपने पुत्रों को क्यों प्रवाहित किया?
कथा के अनुसार वे सात वसु थे जो श्राप के कारण जन्म ले रहे थे और शीघ्र मुक्ति चाहते थे। आठवाँ पुत्र देवव्रत जीवित रहा।





