सोम प्रदोष व्रत 2026: प्रदोष काल, पूजा विधि और सावन में इसका महत्व

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प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और इसकी पूजा प्रदोष काल में — सूर्यास्त से लगभग डेढ़ घंटे की अवधि में — की जाती है। सोमवार को पड़ने पर इसे सोम प्रदोष कहते हैं, जो मनोकामना पूर्ति और संतान सुख के लिए विशेष माना जाता है।

प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है — शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में। जिस वार को यह पड़े, उसी नाम से पुकारा जाता है। सोमवार को पड़ने पर सोम प्रदोष, और सावन में पड़ने पर इसका महत्व और बढ़ जाता है।

प्रदोष काल क्या है

प्रदोष काल सूर्यास्त से आरंभ होकर लगभग डेढ़ घंटे तक रहता है — संध्या और रात्रि के बीच का संधिकाल। मान्यता है कि इसी समय भगवान शिव कैलाश पर आनंद-नृत्य करते हैं, इसलिए यह काल उनकी आराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

यही कारण है कि प्रदोष व्रत की पूजा प्रातः नहीं, संध्या को की जाती है। दिनभर उपवास रखकर प्रदोष काल में पूजा की जाती है और उसके बाद पारण होता है।

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वार के अनुसार फल

वार नाम परंपरागत मान्यता
सोमवार सोम प्रदोष मनोकामना पूर्ति, संतान सुख
मंगलवार भौम प्रदोष रोग-निवारण, ऋण मुक्ति
बुधवार सौम्य प्रदोष विद्या और बुद्धि
गुरुवार गुरु प्रदोष शत्रु-बाधा शांति
शुक्रवार भृगु प्रदोष दांपत्य सुख
शनिवार शनि प्रदोष संतान प्राप्ति, शनि दोष शांति
रविवार भानु प्रदोष आरोग्य और दीर्घायु

पूजा विधि

  • दिनभर उपवास रखें — फलाहार लिया जा सकता है
  • सूर्यास्त से पूर्व स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें
  • प्रदोष काल आरंभ होने पर शिवलिंग का जल और पंचामृत से अभिषेक करें
  • बेलपत्र, धतूरा, आक, सफेद पुष्प और भस्म अर्पित करें
  • घी का दीप जलाकर ॐ नमः शिवाय का जप करें
  • प्रदोष व्रत कथा का श्रवण करें
  • शिव आरती के बाद पारण करें

व्रत कथा का सार

स्कंद पुराण में आई कथा के अनुसार एक निर्धन ब्राह्मणी अपने पुत्र के साथ भिक्षा माँगकर जीवन यापन करती थी। एक दिन उसे विदर्भ का राजकुमार धर्मगुप्त मिला, जिसका राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था।

ब्राह्मणी ने उसे पुत्रवत अपनाया और शांडिल्य ऋषि के परामर्श से प्रदोष व्रत आरंभ किया। व्रत के प्रभाव से धर्मगुप्त को गंधर्व कन्या अंशुमती से विवाह और गंधर्व सेना की सहायता प्राप्त हुई, और उसने अपना राज्य पुनः प्राप्त किया।

सावन में प्रदोष का विशेष महत्व

श्रावण मास स्वयं शिव को समर्पित है। इस मास में पड़ने वाला प्रदोष व्रत दोहरा महत्व रखता है — त्रयोदशी का प्रदोष काल और श्रावण का शिव-प्रिय मास, दोनों का संयोग।

जो पूरे सावन उपवास नहीं रख सकते, उनके लिए प्रदोष व्रत एक संतुलित विकल्प माना जाता है — मास में दो बार, और वह भी संध्या तक।

शुभ मुहूर्त — 11 August 2026

तिथि कृष्ण पक्ष — चतुर्दशी
नक्षत्र पुनर्वसु
सूर्योदय 05:48
सूर्यास्त 19:04
राहु काल 15:45 – 17:25 (इस समय शुभ कार्य टालें)
प्रदोष काल 19:04 – 21:28
तिथि समाप्ति 01:55

ये समय दिल्ली के लिए गणित हैं और भारतीय मानक समय में दिए गए हैं। अन्य नगरों में सूर्योदय-सूर्यास्त के अनुसार कुछ मिनटों का अंतर रहेगा। विवाह या गृह प्रवेश जैसे संस्कार के लिए स्थानीय पंचांग एवं आचार्य से पुष्टि करें।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रदोष काल कब से कब तक होता है?

सूर्यास्त से आरंभ होकर लगभग डेढ़ घंटे तक। यह संध्या और रात्रि का संधिकाल है, जिसे शिव पूजा के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

प्रदोष व्रत महीने में कितनी बार आता है?

दो बार — शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को।

क्या प्रदोष व्रत में जल पी सकते हैं?

हाँ। यह निर्जला व्रत नहीं है। दिनभर फलाहार और जल लिया जा सकता है, पारण प्रदोष काल की पूजा के बाद होता है।

सोम प्रदोष का क्या फल माना जाता है?

परंपरा में सोम प्रदोष को मनोकामना पूर्ति और संतान सुख के लिए विशेष फलदायी माना गया है।