शिव आरती — ॐ जय शिव ओंकारा: सम्पूर्ण लिरिक्स और अर्थ
Short answer
ॐ जय शिव ओंकारा भगवान शिव की सर्वाधिक प्रचलित आरती है, जो सावन सोमवार, महाशिवरात्रि और नित्य पूजा में गाई जाती है। इसमें शिव के त्रिदेव स्वरूप — ब्रह्मा, विष्णु और सदाशिव — की एकता का वर्णन है। आरती पूजा के अंत में दीप घुमाकर की जाती है।
ॐ जय शिव ओंकारा शिव आराधना की सबसे प्रचलित आरती है। सावन के सोमवार, महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत और नित्य पूजा — हर अवसर पर यही आरती गाई जाती है।
आरती के बोल
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥एकानन चतुरानन पंचानन राजे।
हंसासन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥यह भी पढ़ें: दुर्गा चालीसा: भक्ति और शक्ति का एक कालजयी स्तोत्र
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज ते सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालनकारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥यह भी पढ़ें: नारायणी स्तुति क्या है और इसका महत्व
त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपति पावे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥
आरती का भाव
इस आरती की केंद्रीय पंक्ति है — प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका। इसका अर्थ है कि ॐ के भीतर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों एक ही हैं। यह अद्वैत का भाव है, जो आरती को केवल स्तुति से आगे ले जाता है।
एकानन चतुरानन पंचानन — एक मुख वाले, चार मुख वाले और पाँच मुख वाले — यह शिव के विभिन्न स्वरूपों का संकेत है। त्रिपुरारी अर्थात त्रिपुरासुर का संहार करने वाले।
आरती की विधि
- पूजा के अंत में आरती की जाती है
- दीप को घड़ी की दिशा में गोलाकार घुमाया जाता है
- पहले चरणों की ओर चार बार, फिर नाभि के पास दो बार, फिर मुख की ओर एक बार, फिर सर्वांग सात बार
- आरती के बाद जल घुमाकर छोड़ा जाता है
- अंत में आरती की ज्योति को हाथों से लेकर शीश पर लगाया जाता है
कब गाएँ
यह आरती नित्य संध्या पूजा में गाई जा सकती है। सावन के सोमवार, प्रदोष व्रत, महाशिवरात्रि और श्रावण शिवरात्रि पर इसका विशेष महत्व है। प्रदोष काल — सूर्यास्त के आसपास का समय — शिव आरती के लिए सर्वोत्तम माना गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
ॐ जय शिव ओंकारा आरती किसने लिखी?
आरती के अंतिम चरण में “कहत शिवानंद स्वामी” आता है, जिससे रचयिता के रूप में शिवानंद स्वामी का नाम जोड़ा जाता है।
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शिव आरती कब गानी चाहिए?
नित्य संध्या पूजा में, तथा सावन सोमवार, प्रदोष व्रत और शिवरात्रि पर विशेष रूप से। प्रदोष काल सर्वोत्तम माना गया है।
आरती का दीपक कैसे घुमाएँ?
घड़ी की दिशा में — चरणों की ओर चार बार, नाभि के पास दो बार, मुख की ओर एक बार और सर्वांग सात बार।
प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका का अर्थ क्या है?
ॐ के भीतर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों एक ही हैं — यह अद्वैत का भाव है, जो इस आरती का केंद्रीय संदेश है।





